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सरई में बीजेपी नेता रमापति जायसवाल और उनके भाई के घर वन विभाग की कार्रवाई से हड़कंप
Singrauli News: सिंगरौली। जंगलों की रक्षा और वन संपदा की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले विभाग की कार्रवाई अब सरई में राजनीतिक हलचल का कारण बन गई है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता एवं पार्षद रमापति जायसवाल और उनके भाई जागवली जायसवाल के घर से वन विभाग ने साल की लकड़ी के पांच नग जब्त किए हैं। जब्त लकड़ी की कुल मात्रा 2.671 घनमीटर दर्ज की गई है। सबसे अहम बात यह है कि लकड़ी की खरीद और कटाई से संबंधित वैधानिक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जा सके। इसके बाद वन विभाग ने 31 अक्टूबर 2026 को वन अपराध प्रकरण क्रमांक 278/05 दर्ज कर जांच शुरू कर दी। लगातार दो दिनों तक चली विभागीय कार्रवाई ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल सिर्फ लकड़ी की बरामदगी का नहीं, बल्कि उसके स्रोत, भंडारण और संभावित कारोबार के पीछे की पूरी कहानी का है।
जनप्रतिनिधि के घर इतनी लकड़ी पहुंची कैसे?
मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर वन विभाग ने ग्राम सरई स्थित रमापति जायसवाल और उनके भाई जागवली जायसवाल के घर पहुंचकर जांच की। विभागीय दस्तावेज के अनुसार, वहां रखी साल की लकड़ी के संबंध में खरीद और कटाई के वैध दस्तावेज मांगे गए, लेकिन दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा सके। इसके बाद वन अमले ने लकड़ी जब्त कर मध्यप्रदेश वनोपज (व्यापार विनियमन) अधिनियम, 1969 के तहत वन अपराध दर्ज किया। अब सवाल यह है कि साल जैसी बेशकीमती लकड़ी आखिर कहां से आई? क्या इसे वैध रूप से खरीदा गया था? यदि खरीद वैध थी तो उसके दस्तावेज क्यों नहीं मिले? क्या जंगलों से लकड़ी की कटाई कर उसका संग्रहण किया जा रहा था? इन सवालों का जवाब जांच में सामने आना चाहिए।
पांच नग लकड़ी, 2.671 घनमीटर का हिसाब
वन विभाग के जब्ती पंचनामा में साल के पांच नग दर्ज हैं। इनकी कुल मात्रा 2.671 घनमीटर बताई गई है। यह कोई सामान्य घरेलू लकड़ी का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब लकड़ी की वैधता से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं हुए तो विभाग ने वन अपराध दर्ज किया है। हालांकि बरामद लकड़ी की वास्तविक बाजार कीमत का आधिकारिक आकलन अभी सामने नहीं आया है।
दो दिन की कार्रवाई, अब पूरे नेटवर्क की जांच जरूरी
लगातार दो दिनों तक चली कार्रवाई के बाद अब जांच का दायरा केवल जब्त लकड़ी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वन विभाग को यह पता लगाना होगा कि लकड़ी कहां से लाई गई, किसने उपलब्ध कराई, उसका परिवहन किस माध्यम से हुआ और क्या इसके पीछे खरीद-बिक्री का कोई नेटवर्क सक्रिय है। यदि जंगलों से अवैध कटाई की गई है तो इसमें शामिल लोगों की पहचान कर कार्रवाई करना भी जरूरी है।
राजनीतिक पहचान बड़ी या कानून?
इस मामले में संबंधित व्यक्ति का बीजेपी का वरिष्ठ नेता और पार्षद होना इसे और संवेदनशील बनाता है। जनप्रतिनिधि होने का अर्थ जनता के प्रति जवाबदेही है, न कि कानून से ऊपर होना। वन संपदा किसी राजनीतिक दल, जनप्रतिनिधि या निजी कारोबारी की संपत्ति नहीं, बल्कि सार्वजनिक प्राकृतिक धरोहर है। इसलिए इस मामले में किसी भी तरह का राजनीतिक दबाव या पक्षपात जांच की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकता है। बीजेपी जिला संगठन को भी इस मामले में अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। वहीं वन विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच पूरी तरह तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर हो, न कि किसी के पद या राजनीतिक प्रभाव को देखकर।
वन विभाग के सामने अब असली परीक्षा
सरई क्षेत्र के जंगलों की सुरक्षा को लेकर यह मामला कई सवाल छोड़ गया है। पांच नग साल की लकड़ी जब्त कर वन अपराध दर्ज करना कार्रवाई का शुरुआती हिस्सा है। असली चुनौती यह पता लगाने की है कि लकड़ी का स्रोत क्या था और यदि इसके पीछे कोई अवैध कारोबार था तो उसके अन्य हिस्सेदार कौन हैं।