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Singrauli News: सिंगरौली विकास प्राधिकरण अध्यक्ष की नियुक्ति पत्र को लेकर मचा बबाल, आदेश बताया फ़र्जी

Admin Posted on: 2026-05-09 13:16:00 Viewer: 76 Comments: 0 Country: India City: Singrauli

Singrauli News: सिंगरौली विकास प्राधिकरण अध्यक्ष की नियुक्ति पत्र को लेकर मचा बबाल, आदेश बताया फ़र्जी Singrauli News: Uproar Erupts Over Appointment Letter of Singrauli Development Authority Chairman; Order Declared Fake!

प्राधिकरण के सीईओ ने कहा इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं

Singrauli News: सिंगरौली/भोपाल। सिंगरौली विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद को लेकर सामने आया फर्जी नियुक्ति पत्र अब प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में बड़ा विवाद बन गया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व जिलाध्यक्ष वीरेंद्र गोयल को अध्यक्ष बनाए जाने का कथित आदेश वायरल होने के बाद अब पूरा मामला सरकारी लापरवाही, फर्जीवाड़े और प्रशासनिक समन्वय की गंभीर कमी को उजागर करता नजर आ रहा है। मीडिया में चल रही खबरों में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि जिस सिंगरौली विकास प्राधिकरण में नई नियुक्ति को लेकर राजनीतिक बधाइयों का दौर चल रहा था, उसे प्रदेश सरकार तकनीकी रूप से भंग करना ही भूल गई थी।

वायरल पत्र से शुरू हुआ पूरा विवाद
एक मई 2026 को प्रदेश में निगम-मंडलों और प्राधिकरणों में नियुक्तियों की खबरों के बीच वीरेंद्र गोयल को सिंगरौली विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाए जाने का एक पत्र सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफॉर्म पर तेजी से वायरल हुआ। वीरेंद्र गोयल भाजपा के वरिष्ठ नेता और सिंगरौली भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष रह चुके हैं, इसलिए राजनीतिक स्तर पर इसे बड़ी नियुक्ति माना गया। वायरल पत्र के बाद समर्थकों ने बधाइयां देना शुरू कर दिया। शहर में पोस्टर और होर्डिंग लगाए गए। यहां तक कि उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने भी उन्हें मिठाई खिलाकर शुभकामनाएं दीं। लेकिन कुछ ही समय बाद मामला पलट गया, जब पता चला कि विभाग की ओर से ऐसा कोई आदेश जारी ही नहीं हुआ था।

सरकार सिंगरौली विकास प्राधिकरण को भंग करना ही भूल गई
मीडिया में चल रही खबरों में बताया गया कि मामले की पड़ताल में एक और बड़ी प्रशासनिक चूक सामने आई। दरअसल 13 फरवरी 2024 को मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देश पर प्रदेश के विभिन्न निगम-मंडलों और प्राधिकरणों के अशासकीय पदाधिकारियों की नियुक्तियां निरस्त कर दी गई थीं। इसके लिए 46 निगम-मंडलों की सूची जारी की गई थी, लेकिन अधिकारियों ने उस सूची में सिंगरौली विकास प्राधिकरण का नाम शामिल ही नहीं किया। बताया जा रहा है कि सूची तैयार करते समय रेरा जैसे संस्थानों का नाम तो जोड़ दिया गया, लेकिन सिंगरौली विकास प्राधिकरण को शामिल करना ही भूल गए। यही कारण है कि तकनीकी रूप से आज भी प्राधिकरण के अध्यक्ष दिलीप शाह माने जा रहे हैं। जानकारी के अनुसार वे अब तक प्राधिकरण से जुड़े विकास कार्यों और फंड संबंधी प्रक्रियाओं में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।

फर्जी आदेश में कई तकनीकी खामियां
मीडिया रिपोर्ट्स और विभागीय स्तर पर हुई पड़ताल में वायरल आदेश को लेकर कई गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं—
आदेश का प्रारूप सामान्य सरकारी आदेशों से अलग और बेहद अनौपचारिक दिखाई दे रहा है।
पत्र में प्रयुक्त फॉन्ट और डिजाइन असंतुलित नजर आ रहे हैं, जिन्हें AI या Canva जैसे डिजिटल टूल से तैयार किया गया प्रतीत हो रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि जिस “अवर सचिव अजय कुमार सिंह” के नाम से आदेश जारी बताया गया, उस नाम का कोई अधिकारी मंत्रालय में पदस्थ ही नहीं है। इन खामियों के बावजूद पत्र को कई लोगों ने वास्तविक मान लिया और राजनीतिक हलकों में बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया।

अब उठ रहा बड़ा सवाल — फर्जी पत्र किसने बनाया?
अब सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो गया है कि जब नगरीय प्रशासन विभाग से ऐसा कोई आदेश जारी ही नहीं हुआ, तो आखिर यह पत्र किसने तैयार किया और इसे वायरल किसने कराया? चूंकि उसी दिन प्रदेश में अन्य निगम-मंडलों में नियुक्तियों की खबरें भी चल रही थीं, इसलिए इस पत्र को भी बिना सत्यापन के सही मान लिया गया। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार अब विभागीय स्तर पर इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है।

क्या बोले अधिकारी
नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने स्पष्ट किया कि सिंगरौली विकास प्राधिकरण अध्यक्ष की नियुक्ति का कोई आदेश जारी नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि वायरल पत्र पूरी तरह फर्जी है और इसकी जानकारी मुख्यमंत्री को भी दे दी गई है।

वहीं वर्तमान अध्यक्ष दिलीप शाह ने कहा कि अभी तक ऐसा कोई पत्र प्राप्त नहीं हुआ है। न ही सासन के द्वारा मुझे कोई पत्र द्वारा या ई-मेल, संदेश इत्यादि अन्य किसी माध्यम से कोई विभागीय सूचना या आदेश प्राप्त हुआ है। अतः वर्तमान में इस संबंध में मेरे पास कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

प्राधिकरण के सीईओ सुरेश जाधव ने भी कहा कि उन्हें नियुक्ति संबंधी कोई अधिकृत पत्र प्राप्त नहीं हुआ है और उनके पास इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

प्रशासनिक विश्वसनीयता पर उठे सवाल
पूरा मामला अब केवल एक फर्जी पत्र तक सीमित नहीं रह गया है। इस घटनाक्रम ने सरकारी कार्यप्रणाली, नियुक्ति प्रक्रिया और प्रशासनिक समन्वय पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर सरकार निगम-मंडलों और प्राधिकरणों में नई नियुक्तियों की प्रक्रिया चला रही थी, वहीं दूसरी ओर एक ऐसा प्राधिकरण सामने आया जिसे तकनीकी रूप से भंग करना ही भूल गए। ऊपर से फर्जी आदेश वायरल होने के बाद भी कई स्तरों पर उसकी पुष्टि तक नहीं की गई। यह मामला बताता है कि सरकारी प्रक्रियाओं में छोटी लापरवाही भी किस तरह बड़े विवाद और भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है। फिलहाल अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है।

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