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जिला शिक्षा अधिकारी सहित कई अधिकारियों पर प्रकरण दर्ज, जब्त दस्तावेज खोलेंगे भ्रष्टाचार की परतें
Singrauli News: सिंगरौली। जिले के शिक्षा विभाग में कथित करोड़ों रुपये की खरीदी अनियमितताओं को लेकर रीवा लोकायुक्त पुलिस की कार्रवाई ने प्रशासनिक हलकों में भूचाल ला दिया है। प्रारंभिक जांच में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के संकेत मिलने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी सहित कई जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया गया है। इस कार्रवाई के बाद न केवल शिक्षा विभाग, बल्कि पूरे जिले में सरकारी खरीदी व्यवस्था, जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो गई है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि जिन मदों में करोड़ों रुपये खर्च किए गए, वे सीधे विद्यार्थियों, विद्यालयों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े हुए हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल आर्थिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य से जुड़ी योजनाओं के साथ खिलवाड़ माना जाएगा।
करोड़ों की खरीदी अब जांच के घेरे में
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि 558 विद्यालयों में स्वच्छता एवं कीटाणुशोधन सामग्री की खरीदी पर लगभग 97 लाख 67 हजार रुपये खर्च किए गए। इसके अलावा 19 विद्यालयों में वर्चुअल रियलिटी प्रयोगशालाओं की स्थापना के नाम पर करीब 4 करोड़ 68 लाख 16 हजार रुपये व्यय किए गए। वहीं 61 विद्यालयों में विद्युत व्यवस्था, उपकरण तथा सामान्य मरम्मत कार्यों पर लगभग 3 करोड़ 5 लाख रुपये खर्च किए जाने की जानकारी सामने आई है। इन सभी मदों में निविदा प्रक्रिया, दर निर्धारण, आपूर्ति, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान प्रणाली को लेकर गंभीर संदेह व्यक्त किए गए हैं।
किन अधिकारियों पर गिरी गाज
लोकायुक्त पुलिस ने जिला शिक्षा अधिकारी सूर्यभान सिंह, सहायक संचालक शिक्षा राजधर साकेत, जिला परियोजना समन्वयक रामलखन शुक्ल, सहायक परियोजना समन्वयक (वित्त) छविलाल सिंह सहित अन्य संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध मामला दर्ज किया है। इस कार्रवाई ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अब विभागीय स्तर पर लिए गए निर्णय भी जांच के दायरे से बाहर नहीं हैं।
दस्तावेजों से खुलेगा पूरा खेल
लोकायुक्त टीम ने 15 अप्रैल 2026 को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय पहुंचकर कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए। इनमें निविदा अभिलेख, स्वीकृति आदेश, सामग्री आपूर्ति रिकॉर्ड, बिल, भुगतान विवरण और संबंधित प्रशासनिक फाइलें शामिल बताई जा रही हैं। अब इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर यह पता लगाया जाएगा कि खरीदी प्रक्रिया किस प्रकार हुई, किसे लाभ पहुंचाया गया और किन नियमों की अनदेखी की गई।
शिक्षा के नाम पर यदि खेल हुआ, तो गंभीर मामला
यह मामला केवल धनराशि का नहीं, बल्कि विश्वास का है। जिन विद्यालयों में संसाधन पहुंचने थे, यदि वहां सामग्री नहीं पहुंची या मानक स्तर की नहीं मिली, तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों पर पड़ा होगा। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के कई विद्यालय पहले से संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में यदि शिक्षा के नाम पर स्वीकृत धनराशि में गड़बड़ी हुई, तो यह व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
जवाबदेही तय होना जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि जांच केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि—
सामग्री वास्तव में खरीदी गई या नहीं
विद्यालयों तक पहुंची या नहीं
निर्धारित गुणवत्ता की थी या नहीं
भुगतान किस आधार पर स्वीकृत किया गया
निरीक्षण और सत्यापन किसने किया
जब तक इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आते, तब तक जनता के मन में संदेह बना रहेगा।
पूरे जिले की नजर जांच पर
लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद जिले भर में इस मामले की चर्चा है। अभिभावक, शिक्षक, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक जानना चाहते हैं कि शिक्षा के नाम पर खर्च हुए करोड़ों रुपये का वास्तविक उपयोग कहां हुआ। अब लोगों की नजर इस बात पर है कि जांच कितनी निष्पक्ष, कितनी गहरी और कितनी प्रभावी होती है।
सख्त संदेश की आवश्यकता
सिंगरौली जैसे तेजी से विकसित हो रहे जिले में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि शिक्षा विभाग जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तो यह समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। अब आवश्यकता केवल कार्रवाई की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जहां सरकारी धन सीधे जनता तक पहुंचे और कोई भी अधिकारी जवाबदेही से बच न सके।