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Singrauli News: In a government school, children are being made to wash used plates in the name of the midday meal.
देवसर के गोड़गवां पूर्व माध्यमिक विद्यालय में अव्यवस्थाओं का आलम, रसोइया की गैर-जिम्मेदाराना दलील ने व्यवस्था पर खड़े किए सवाल
Singrauli News: सिंगरौली। सरकारी स्कूलों में बच्चों को शिक्षा के साथ स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी शिक्षा विभाग की है, लेकिन देवसर विकासखंड के शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय गोड़गवां से सामने आया वीडियो इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करता है। 30 अक्टूबर 2026 के वीडियो में स्कूल के मासूम छात्र-छात्राएं मध्याह्न भोजन करने के बाद अपनी जूठी थालियां स्वयं धोते दिखाई दे रहे हैं। वह भी विद्यालय के भीतर किसी व्यवस्थित स्थान पर नहीं, बल्कि परिसर के बाहर सड़क किनारे पानी की टंकी के पास कीचड़ के बीच। यह दृश्य केवल एक विद्यालय की अव्यवस्था नहीं, बल्कि बच्चों के प्रति जिम्मेदार व्यवस्था की संवेदनशीलता पर भी सवाल है।
विडंबना यह है कि जिन बच्चों के हाथों में कॉपी-किताब होनी चाहिए, उन्हें भोजन के बाद जूठे बर्तन साफ करने पड़ रहे हैं। विद्यालय में भोजन के लिए बैठने की समुचित व्यवस्था तक नहीं है। न टाट-पट्टी का इंतजाम है और न ही डाइनिंग शेड की सुविधा। नतीजतन बच्चे धूल-मिट्टी के बीच जमीन पर बैठकर भोजन करने को मजबूर हैं। विद्यार्थियों ने यह भी बताया कि उन्हें रोजाना अपनी थालियां स्वयं धोनी पड़ती हैं। इतना ही नहीं, परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता को लेकर भी बच्चों ने सवाल उठाए हैं।
‘जब दूसरे समूह में बर्तन नहीं धोए जाते तो मैं क्यों धोऊं’
मामले की गंभीरता तब और बढ़ जाती है, जब समूह की महिला रसोइया से बच्चों के बर्तन धुलवाने को लेकर सवाल किया जाता है। उसका जवाब था—‘जब दूसरे समूह में बर्तन नहीं धोए जाते तो मैं क्यों धोऊं।’ यह जवाब जिम्मेदारी से बचने की मानसिकता को उजागर करता है। रसोइयों की ओर से पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने और दूर से पानी लाने की परेशानी का हवाला दिया गया है। लेकिन पानी की समस्या का समाधान बच्चों से जूठी थालियां धुलवाना नहीं हो सकता। यह जिम्मेदारी संबंधित व्यवस्था और जिम्मेदार लोगों की है।
मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ उनके स्कूल आने और पढ़ाई से जुड़े रहने को प्रोत्साहित करना है। ऐसे में भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और बच्चों की गरिमा से समझौता किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। बच्चों को कीचड़ के बीच बर्तन धोने के लिए मजबूर होना पड़े और भोजन के लिए बैठने तक की सुविधा न मिले, तो यह व्यवस्था की गंभीर खामी है।
इस मामले में केवल रसोइया या समूह पर जिम्मेदारी डालकर विभाग अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकता। विद्यालय प्रबंधन, संबंधित समूह और शिक्षा विभाग के अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। यह पता लगाया जाना जरूरी है कि विद्यालय में बैठने, पानी और स्वच्छता की व्यवस्था क्यों नहीं है और बच्चों से रोजाना बर्तन क्यों धुलवाए जा रहे हैं। भोजन की गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतों की भी जांच होनी चाहिए।
ग्रामीणों और अभिभावकों की नाराजगी स्वाभाविक है। उन्होंने जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। अब आवश्यकता केवल जांच के आश्वासन की नहीं, बल्कि मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति देखने और कमियों को दूर करने की है। बच्चों के बैठने की व्यवस्था, नियमित जलापूर्ति, भोजन की गुणवत्ता और बर्तनों की सफाई की जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही लापरवाही सामने आने पर संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।
बच्चों को स्कूल में पढ़ने, सुरक्षित रहने और सम्मान के साथ भोजन करने का अधिकार है। उन्हें जूठी थालियां धोने और अव्यवस्थाओं का बोझ उठाने के लिए छोड़ देना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता। शिक्षा विभाग को इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जवाबदेही तय करनी चाहिए, ताकि सरकारी स्कूलों में बच्चों को कम से कम बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष न करना पड़े।
इनका कहना है—
डीपीसी रामलखन शुक्ल ने बताया कि विद्यालय में मध्याह्न भोजन संचालित करने वाले समूहों को ही बच्चों की थालियां धोनी हैं। बच्चों को थालियां नहीं धोनी चाहिए। यदि इस तरह का कोई मामला सामने आया है तो इसकी जांच कराई जाएगी। जांच में शिकायत सही पाए जाने पर संबंधित समूह के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसे हटाया जाएगा।