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पहले 4 करोड़ से निर्माण, फिर मेंटेनेंस और अब 9 करोड़ का नया काम, टिकाऊ हो सड़क इसकी भी तय हो जिम्मेदारी
Singrauli News: सिंगरौली। शहर की सड़कों पर सरकारी धन खर्च होने के बाद भी यदि कुछ ही समय में उनकी हालत बिगड़ जाए, तो सवाल निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर उठना लाजिमी है। माजन मोड़ से नवजीवन विहार होते हुए इंदिरा चौक तक सड़क डामरीकरण का काम इसी वजह से चर्चा में है। करीब 6.50 किलोमीटर लंबी सड़क पर डीएमएफ मद से 9 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन काम की गुणवत्ता को लेकर शुरुआत में ही आपत्तियां सामने आने लगी हैं। स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब इसी सड़क पर पहले करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, तो अब दोबारा भारी भरकम राशि खर्च करने के बावजूद टिकाऊ सड़क की गारंटी कौन देगा?
एक सड़क, तीन बार खर्च; जवाबदेही किसकी?
स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार, करीब पांच वर्ष पहले इसी मार्ग का डामरीकरण लगभग 4 करोड़ रुपये की लागत से कराया गया था। सड़क खराब होने के बाद मेंटेनेंस भी कराया गया, लेकिन आरोप है कि मरम्मत के कुछ समय बाद ही सड़क फिर उखड़ने लगी और जगह-जगह गड्ढे बन गए। अब उसी सड़क पर करीब 9 करोड़ रुपये की लागत से फिर डामरीकरण कराया जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि पहले हुए निर्माण की गुणवत्ता की जांच हुई या नहीं? मेंटेनेंस पर खर्च के बाद सड़क दोबारा खराब क्यों हुई? और क्या मौजूदा निर्माण में पिछली कमियों से सबक लिया जा रहा है? इन सवालों के जवाब सामने आए बिना करोड़ों रुपये के नए खर्च की उपयोगिता पर सवाल बने रहेंगे।
शुरुआत में मोटाई पर आपत्ति, फिर बढ़ाई गई परत
स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण कार्य की शुरुआत में सड़क की मोटाई निर्धारित मानकों और संविदा शर्तों के अनुरूप नहीं रखी जा रही थी। शिकायतों के बाद नगर निगम आयुक्त सविता प्रधान की नाराजगी के बाद ठेकेदार द्वारा मोटाई बढ़ाए जाने की बात कही जा रही है। इसके बावजूद सड़क की सतह समतल करने और डामरीकरण की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। यदि निर्माण की शुरुआत में ही मोटाई को लेकर आपत्ति उठी, तो यह जांच का विषय है कि काम शुरू होने से पहले तकनीकी निगरानी और गुणवत्ता परीक्षण की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी। हालांकि, मानकों के उल्लंघन की पुष्टि तकनीकी जांच और निर्माण रिकॉर्ड के परीक्षण से ही हो सकेगी।
पुराना ठेकेदार, वही सड़क; निगरानी पर भी सवाल
बताया जाता है कि शिवशंकर इलेक्ट्रिकल एंड सिविल इंजीनियरिंग से जुड़े ठेकेदार ने पहले भी इसी मार्ग का निर्माण कराया था। अब दोबारा उसी सड़क पर काम होने से स्थानीय स्तर पर निर्माण एजेंसी की जवाबदेही और नगर निगम की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। लोगों की मांग है कि केवल काम पूरा होने की औपचारिकता न निभाई जाए, बल्कि डामर की मोटाई, इस्तेमाल की गई सामग्री, सड़क की सतह और निर्धारित तकनीकी मानकों की स्वतंत्र जांच कराई जाए। पुराने निर्माण और मेंटेनेंस के रिकॉर्ड की समीक्षा भी हो, ताकि यह पता चल सके कि सड़क बार-बार खराब होने के पीछे वास्तविक कारण क्या रहे।
9 करोड़ खर्च होंगे, तो टिकाऊ सड़क की जिम्मेदारी भी तय हो
स्थानीय लोगों ने कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त से मांग की है कि निर्माण कार्य की जांच किसी स्वतंत्र तकनीकी एजेंसी से कराई जाए और गुणवत्ता में कमी मिलने पर नियमानुसार जिम्मेदारी तय की जाए। सड़क निर्माण की प्रगति के साथ गुणवत्ता परीक्षण के नतीजे भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए, ताकि लोगों को पता चल सके कि सरकारी धन का उपयोग निर्धारित मानकों के अनुसार हो रहा है या नहीं।