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Sidhi News: सीधी में स्वास्थ्य विभाग की मोबाइल हेल्थ यूनिट बदहाल, जनता के पैसे से खरीदे वाहन बने कबा
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ग्रामीणों को इलाज देने वाली योजना खुद बदहाली की शिकार, न मरम्मत का हिसाब, न जवाबदेही का पता
Sidhi News: सीधी। सरकारी खजाने से लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर खरीदे गए वाहन यदि जनता को स्वास्थ्य सुविधाएं देने के बजाय कबाड़ की शक्ल लेने लगें, तो सवाल सिर्फ बदहाली का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही का भी है। सीधी जिले में स्वास्थ्य विभाग की मोबाइल हेल्थ केयर यूनिट वैन की हालत ने सरकारी संसाधनों के रखरखाव और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन वाहनों को दूरदराज के गांवों तक इलाज पहुंचाने का माध्यम बनना था, उनकी दुर्दशा सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवालिया निशान लगा रही है।
जनता के पैसे से खरीदे वाहन, फिर ऐसी दुर्दशा क्यों?
मोबाइल हेल्थ केयर यूनिट का मकसद उन ग्रामीण इलाकों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना है, जहां अस्पतालों और चिकित्सा सेवाओं तक पहुंचना आसान नहीं है। इन वाहनों के जरिए मरीजों की जांच और उपचार संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। लेकिन जब यही वाहन देखरेख के अभाव में अनुपयोगी होने लगें, तो योजना के उद्देश्य और उसके क्रियान्वयन के बीच का अंतर साफ नजर आता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी धन से खरीदे गए इन वाहनों की नियमित निगरानी किसने की? समय पर मरम्मत क्यों नहीं कराई गई? यदि वाहन लंबे समय से अनुपयोगी हैं, तो उन्हें चालू कराने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए? इन सवालों पर विभाग की जवाबदेही तय होना जरूरी है।
मरम्मत पर कितना खर्च हुआ, हिसाब कौन देगा?
वाहनों की बदहाली के बीच उनके रखरखाव पर खर्च की गई राशि भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। वाहन कब खरीदे गए, कितने समय तक स्वास्थ्य सेवाओं में इस्तेमाल हुए, कब से अनुपयोगी पड़े हैं और उनकी मरम्मत पर कितना सरकारी धन खर्च किया गया—इन सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
यदि वाहन मामूली खराबी के कारण खड़े हैं, तो उन्हें समय रहते दुरुस्त क्यों नहीं कराया गया? और यदि वे लंबे समय से उपयोग के योग्य नहीं हैं, तो उनकी जगह स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई? इन सवालों का जवाब केवल कागजी रिपोर्ट से नहीं, बल्कि वास्तविक स्थिति और रिकॉर्ड की जांच से मिलना चाहिए।