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सरई तहसील के समीप के.बी ऑनलाइन दुकान पर मनमानी वसूली के आरोप तेज,
Singrauli News: सिंगरौली/सरई। सरई तहसील से कुछ ही कदम की दूरी पर स्थित के.बी ऑनलाइन दुकान एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस दुकान पर गरीब और साधारण ग्रामीणों से खुलेआम मनमाने ढंग से अतिरिक्त शुल्क वसूलने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आधार कार्ड अपडेट, नाम-सुधार, मोबाइल नंबर लिंकिंग, ई-केवाईसी, यहां तक कि जन्म प्रमाण पत्र जारी करवाने जैसी मूलभूत सेवाओं के नाम पर उनसे निर्धारित शुल्क से कई गुना अधिक राशि वसूली जा रही है।
ग्रामीणों की बड़ी शिकायत—“सरकारी काम कराना हो तो पैसे दो, तभी होगा काम”
स्थानीय नागरिकों के अनुसार दुकान संचालक खुले शब्दों में यह कहता है कि अगर सुविधा तुरंत और सही ढंग से चाहिए, तो “एक्स्ट्रा फीस” देनी होगी, अन्यथा फाइलें कई दिनों तक लंबित रख दी जाती हैं। इससे गरीब ग्रामीण बेहद परेशान हैं, क्योंकि आधार या प्रमाण पत्र जैसी आवश्यक सेवाओं में देरी उनके सरकारी योजनाओं, स्कूल प्रवेश, बैंकिंग कार्य और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर सीधा असर डालती है।
ग्रामीणों का कहना है कि निर्धन और अशिक्षित लोग मजबूरी में मनमानी वसूली सहने को विवश हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह डर रहता है कि यदि विरोध किया तो उनका काम नहीं होगा। कई ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि दुकान संचालक अपनी प्रशासनिक “पहुँच” का हवाला देता है और कहता है कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। स्थानीय लोगों के अनुसार, इसी “संरक्षण” के भरोसे वह बिना किसी डर के मनमाना शुल्क लेता है और गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाता है।
लोग बोले—सरकारी सेवाओं को बनाया निजी व्यवसाय
ग्रामीणों ने इस पूरे मामले को एक गंभीर शोषण बताया है। उनका कहना है कि सरकार द्वारा आम जनता के लिए बनाई गई डिजिटल सेवाओं को दुकान संचालक ने अपना निजी व्यवसाय बना दिया है, जहां हर कार्य के लिए मोटी फीस तय है। कई लोगों ने बताया कि आधार संशोधन का काम, जो सामान्यतः फ्री या न्यूनतम ₹50–₹100 शुल्क में होना चाहिए, उसके लिए ₹200 से ₹500 तक, जबकि जन्म प्रमाण पत्र के लिए ₹300 से ₹1000 तक वसूला जा रहा है।
प्रशासन की भूमिका पर उठ रहे सवाल
इस मामले को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रशासन इस अनियमितता से अनजान कैसे है? सरई तहसील कार्यालय से चंद कदम दूरी पर ही अगर ऐसी खुली वसूली हो रही है, तो क्या अधिकारियों की नजर इस पर नहीं पड़ती? स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब भी ऐसी शिकायतें उठती हैं, तो कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन जमीन पर स्थिति जस की तस बनी रहती है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि: दुकान की समुचित जांच कराई जाए, सरकारी दरों का स्पष्ट बोर्ड दुकान पर अनिवार्य रूप से लगाया जाए, मनमानी वसूली पर रोक लगे, प्रशासनिक संरक्षण की आड़ में हो रहे दुरुपयोग पर सख्ती बरती जाए। अब देखने वाली बात यह होगी कि जिला प्रशासन इस बढ़ते विवाद पर क्या कदम उठाता है। क्या अवैध वसूली पर रोक लगेगी या फिर दुकान संचालक को पहले की तरह “खुली छूट” मिलती रहेगी—यह सवाल अब ग्रामीणों की जुबां पर है।